शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

हिंदी मुहावरे 
अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना - (स्वयं अपनी प्रशंसा करना ) - अच्छे आदमियों को अपने मुहँ मियाँ मिट्ठू बनना शोभा नहीं देता ।


अक्ल का चरने जाना - (समझ का अभाव होना) - इतना भी समझ नहीं सके ,क्या अक्ल चरने गए है ?


अपना हाथ जगन्नाथ:- स्वंय के द्वारा किया गया कार्य ही महत्वपूर्ण होता है.

सौ सुनार की एक लुहार की :- एक महत्वपूर्ण कार्य कई अनर्गल कार्यों से ज्यादा सटीक होता है.

चर गयी भेड्की, कुटिज गयी मोडी:-शक्तिवान द्वारा किये गए कार्य के लिए निर्दोष को सजा मिलना.

सौ चूहे खा के बिल्ली चली हज को :- धूर्त व्यक्ति द्वारा धिकावे का किया गया अच्छा कार्य

सर सलामत तो पगड़ी हजार:- व्यक्ति बाधाओं से मुक्त हो जाये तो अन्य वस्तुओं की परवाह नहीं करनी चाहिए.

अंत भला सब भला:- यदि कार्य का अंत अच्छा हो जाये तो पूरा कार्य ही सफल हो जाता है.

अधजल गगरी छलकत जाय:- मुर्ख व्यक्ति ज्यादा चिल्लाता है, जबकि ज्ञानी शांत रहता है.

ना नों मन तेल होगा ना राधा नाचेगी:- कारण समाप्त हो जाने पर परिणाम स्वतः ही समाप्त हो जायेंगे.

नांच ना जाने आँगन टेढा:-स्वंय की अकुशलता को दूसरों पर थोपना.

ओंखली में सर दिया तो मूसलो से क्या डरना:-जब आफत को निमंत्रण दे ही दिया है तो फिर डरने से क्या फायदा.

अन्धों में काना राजा:-मूर्खों में  कम विद्वान भी श्रेष्ठ माना जाता है.

घर का भेदी लंका ढाए:- राजदार ही विनाश का कारण बनता है.

गरजने वाले बरसते नहीं हैं :- शक्तिहीन व्यक्ति निरर्थक चिल्लाता है. वह कुछ कर नहीं सकता है.

बन्दर क्या जाने अदरक का स्वाद :- मुर्ख एव असक्षम व्यक्ति किसी अच्छी एव मूल्यवान वस्तु का मोल नहीं जान सकता है.


अपने पैरों पर खड़ा होना - (स्वालंबी होना) - युवकों को अपने पैरों पर खड़े होने पर ही विवाह करना चाहिए ।


अक्ल का दुश्मन - (मूर्ख) - राम तुम मेरी बात क्यों नहीं मानते ,लगता है आजकल तुम अक्ल के दुश्मन हो गए हो ।


अपना उल्लू सीधा करना - (मतलब निकालना) - आजकल के नेता अपना अपना उल्लू सीधा करने के लिए ही लोगों को भड़काते है ।


आँखे खुलना - (सचेत होना) - ठोकर खाने के बाद ही बहुत से लोगों की आँखे खुलती है ।


आँख का तारा - (बहुत प्यारा) - आज्ञाकारी बच्चा माँ -बाप की आँखों का तारा होता है ।


आँखे दिखाना - (बहुत क्रोध करना) - राम से मैंने सच बातें कह दी , तो वह मुझे आँख दिखाने लगा ।


आसमान से बातें करना - (बहुत ऊँचा होना) - आजकल ऐसी ऐसी इमारते बनने लगी है ,जो आसमान से बातें करती है ।


ईंट से ईंट बजाना - (पूरी तरह से नष्ट करना) - राम चाहता था कि वह अपने शत्रु के घर की ईंट से ईंट बजा दे।


ईंट का जबाब पत्थर से देना - (जबरदस्त बदला लेना) - भारत अपने दुश्मनों को ईंट का जबाब पत्थर से देगा ।


ईद का चाँद होना - (बहुत दिनों बाद दिखाई देना) - राम ,तुम तो कभी दिखाई ही नहीं देते ,ऐसा लगता है कि तुम ईद के चाँद हो गए हो ।


उड़ती चिड़िया पहचानना - (रहस्य की बात दूर से जान लेना) - वह इतना अनुभवी है कि उसे उड़ती चिड़िया पहचानने में देर नहीं लगती ।


उन्नीस बीस का अंतर होना - (बहुत कम अंतर होना) - राम और श्याम की पहचान कर पाना बहुत कठिन है ,क्योंकि दोनों में उन्नीस बीस का ही अंतर है ।


उलटी गंगा बहाना - (अनहोनी हो जाना) - राम किसी से प्रेम से बात कर ले ,तो उलटी गंगा बह जाए

बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

शिशु गीत सलिला : 1 संजीव 'सलिल'

शिशु गीत सलिला : 1
संजीव 'सलिल'
*
1.श्री गणेश


श्री गणेश की बोलो जय,
पाठ पढ़ो होकर निर्भय।
अगर सफलता पाना है-
काम करो होकर तन्मय।।
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2. सरस्वती


माँ सरस्वती देतीं ज्ञान,
ललित कलाओं की हैं खान।
जो जमकर अभ्यास करे-
वही सफल हो, पा वरदान।। 
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3. भगवान


सुन्दर लगते हैं भगवान,
सब करते उनका गुणगान।
जो करता जी भर मेहनत-
उसको देते हैं वरदान।।
*
4. देवी

देवी माँ जैसी लगती,
काम न लेकिन कुछ करती।
भोग लगा हम खा जाते-
कभी नहीं गुस्सा करती।।
*
5. धरती माता
धरती सबकी माता है,
सबका इससे नाता है।
जगकर सुबह प्रणाम करो-
फिर उठ बाकी काम करो।।
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6. भारत माता

सजा शीश पर मुकुट हिमालय,
नदियाँ जिसकी करधन।
सागर चरण पखारे निश-दिन-
भारत माता पावन।
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7. हिंदी माता

हिंदी भाषा माता है,
इससे सबका नाता है।
सरल, सहज मन भाती है-
जो पढ़ता मुस्काता है।।
*
8. गौ माता

देती दूध हमें गौ माता,
घास-फूस खाती है।
बछड़े बैल बनें हल खीचें
खेती हो पाती है।
गोबर से कीड़े मरते हैं,
मूत्र रोग हरता है,
अंग-अंग उपयोगी
आता काम नहीं फिकता है।
गौ माता को कर प्रणाम
सुख पाता है इंसान।
बन गोपाल चराते थे गौ
धरती पर भगवान।।
*
9. माँ -1
माँ ममता की मूरत है,
देवी जैसी सूरत है।
थपकी देती, गाती है,
हँसकर गले लगाती है।
लोरी रोज सुनाती है,
सबसे ज्यादा भाती है।।
*

10. माँ -2
माँ हम सबको प्यार करे,
सब पर जान निसार करे।
माँ बिन घर सूना लगता-
हर पल सबका ध्यान धरे।।
*

रविवार, 23 जनवरी 2011

मेरा हौसला है ...नारी उत्थान के लिए ....


ज्योति -पथ से एक दिव्य रथ उतरा है ....

शनिवार, 4 दिसंबर 2010

शनिवार, 27 नवंबर 2010

कुर्सी प्राणायाम ---हठयोग से कुर्सियोग तक .........

कुर्सी पर नेता    
कुर्सी प्राणायाम ------
  हे मानव तू कर्म करना छोड़ -------धर्म को अपना ! धर्म से बढ कर कुछ नहीं !
धर्म में भी कुर्सी धर्म सर्वोपरि है . क्योंकि कुर्सीधर्म उधार -धर्म  नहीं है ,नगद धर्म है !इस धर्म में जीते जी सब मिल जाता है .इसलिए सब को छोड़ कुर्सी की शरण में आ जाओ .जिनके पास कुर्सी नहीं है ,वो निराश ना हों ,कुर्सी प्राणायाम करें ,!
 प्रातः काल  जागते ही सबसे पहले यह भावना करे ,कि हम कुर्सिवान हो गए .चित्त सांस पे ,ध्यान कुर्सी पे लगाओ .श्वांस लेते समय ध्यान करो कि जीवनदायनी कुर्सी को भीतर ले रहें हैं .यह कुर्सी योग का अनुलोम प्राणायाम है. प्रतिलोम (सांस बाहर छोड़ते ) में अपने भीतर के सदाचार ,इमानदारी को श्वांस के साथ बाहर निकाल दे .आँख बंद कर के भावना करें ,-हम कुर्सी सागर के मध्य कुर्सी शय्या पे विराजमान हैं .अब भावना करो कि हम कुर्सी युक्त है ,कुर्सी हम से सयुंक्त है ,!हम वो भक्त हैं ,जिसे कुर्सी से विभक्त नहीं किया जा सकता ,चाहे जितने इल्जाम आयें .डरो मत ,तुम्हे कुर्सी एक दिन जरुर मिल जाएगी .,यदि डरोगे तो कुर्सी पाने के संकल्प से दूर हो जाओगे .कुर्सी के वजन से जो कांडों और घोटालों के कारण कई मुखोटे सामने आये हैं ,उससे देश का राष्ट्रीय चरित उभर कर सामने आया है .कुर्सी जमीं पर टिकी रहती है .पर कुर्सीबाज ऊँचा उड़ता है .कुर्सी पे बैठते ही वह चरितवान हो जाता है .सब कांडों के बावजूद ...... कुर्सी पे तशरीफ़ रखते ही हर सड़क उनके घर तक पहुँचती अहि .जो कुर्सिवान नहीं है ,उनके लिए सारी सड़कें बंद होती है .जब कुर्सी कुलदेवी हो जाती है ,तो पूरा परिवार कुलवर्धन बन जाता है .इसलिए कुर्सीयोग करो ,कुर्सी को प्राप्त करो .
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सोमवार, 23 अगस्त 2010

शुक्रवार, 4 जून 2010

ग़ज़ल

 जिन ख्वाबों से नींद उड़ जाए +  ऐसे ख्वाब सजाये कौन
इक पल झूठी  तस्कीं  पा कर  सारी रात  गवाए कौन
यह तन्हाई यह  सन्नाटा दिल को मगर समझाए कौन
इतनी काली रात में आखिर  मिलने -मिलाने आये कौन 
फूल खिले तो चीख उठे सब  सहमे  चमन  में आग  लगी
हाय यह महरूमों की बस्ती  इसमें फूल खिलाये कौन
इक -दो धोखे हों तो यारों  दिल रखने को खा भी लें
यह तो उसकी आदत ठहरी  हर दिन धोखे खाए कौन

सोमवार, 28 सितंबर 2009

purshon ke liye kaanun kyon nahi ?

कुछ दिन पहले एक समाचार पढ़ा ....पति का बदला लेने के लिए सिपाही पर पत्नी ने लगाया दुराचार का आरोप ....यह एक घटना नहीं है . , ऐसे कई मामले सामने आ रहे है जब महिला द्वारा यौन उत्पीडन का या बलात्कार का आरोप बाद में झूठा साबित हुआ .कई विवाहित लड़कियां  ससुराल छोड़ के मायेके वापस आ जाती हैं , और पति /सास -ससुर पे घरेलू हिंसा का आरोप लगाती है. जबकि वो ससुराल की मर्यादा में नहीं रहना चाहती . कई बार मुझे ऐसा लगता है कि आजकल पुरुष भी उतना ही पीड़ित है जितना महिला .....फर्क सिर्फ इतना है कि कोई भी महिला पुरुष /पति पर अत्याचार /अनाचार का केस दायर कर सकती है .जबकि पुरुषों के लिए ऐसा कोई कानून नहीं है .मैंने परिवार परामर्श केंद्र में ऐसे ही अनेक केस देखे हैं .. ये भी एक सच्चाई है कि आज न जाने कितनी युवतियां नाम ,दाम और काम के लिए स्वयं पुरुष के सामने समर्पित होने में कोई संकोच नहीं करती .सच ओत ये है कि ऐसी महिलाएं पुरुषों का मानसिक बलात्कार करती है ... विश्वामित्र को रिझाने के लिए मेनका ने भी यही किया था ,शत्रु - राजा को परास्त करने  के लिए चाणक्य  रूपवती विषकन्या को भेजता  था  आज युवतियां स्वयं ये कर रही है . किसी भी  क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने का शॉर्ट कट रास्ता है. तो फिर यौन उत्पीडन का केस केवल पुरुष पर ही क्यों ?....जबकि गुनाहगार दोनों होते है..अमर मणि ,गुड्डू पंडित ,सच्चिदानन्द साक्षी महराज ........ऐसे जाने कितने उदहारण है. कितने ऐसे पति है जो हर संभव परिवार में तालमेल बिठाने कि कोशिश करते है और पत्नी सास -ससुर से अलग रहने कि जिद. .तो पुरुषों को भी ऐसी महियाओं के विरूद्व ऍफ़ .आर . आइ. दर्ज करने का अधिकार मिलना चाहिए. जब समानता की आवाज उठती है तो कानून में समानता क्यों नहीं ??????

मंगलवार, 22 सितंबर 2009

चौक की कला


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यह १ देवोत्थान का और २ दिवाली का चौक है। कभी दादी -नानी बनाया करती थी । अब तो गोंव में भी करवा चौथ के कलेंडर दीखते हैं। हिंदू त्योहारों में इनका अलग ही सौन्दर्य था। चौक ,रंगोली ,भित्ति चित्र ,अल्पना सब अपना महत्व था। प्रत्येक त्यौहार के अलग चौक और भीती चित्र होते थे। मैंने खोये हुए चौक को बना कर सहेजा है। इसमे नील ,गेरू, खडिया ,सिंदूर,हल्दी ,कोयला का ही प्रयोग किया है। चौक जमीन को लीप कर पूजास्थल में बनते थे। जबकि भित्ति चित्र दिवार पे बनती थी। प्रकृति की निकटता के कारण इसमे चाँद ,सूरज,पशु पक्षी ,फूल पत्ती सींक से उकेरे जाते थे यह एक ऐसी कला थी जिसका मुकाबला चित्रकार हुसैन भी नही कर सकते। मै इस खोई हुई कला को सहेज रही हूँ। होली, रक्षाबंधन ,आदि हर त्यौहार के चौक और भित्ति चित्र की खोज कर रही हूँ । हरे रंग के लिए पत्ती को पिसती हूँ। मुझे इस काम मै मजा आ रहा है । गॉंव मै जब लड़कियों से चौक की जानकारी लेती हूँ तो वो मुझ पर हसंती है। उन्हें इस बारे मै जानकारी नही है। मुझे बुड्डी औरतों से पूछना पड़ता है। हम अपनी कला क्यों खोने दे ?